डिलीवरी के बाद क्यों बढ़ रहा पोस्टपार्टम डिप्रेशन का खतरा? नई माताओं की मानसिक सेहत पर गंभीर असर, समय रहते पहचानना बेहद जरूरी

नई दिल्ली: बच्चे का जन्म किसी भी परिवार के लिए खुशियों का सबसे बड़ा पल माना जाता है। घर में नए मेहमान के आने से उत्साह और उमंग का माहौल बन जाता है, लेकिन इसी दौरान कई महिलाएं मानसिक दबाव और भावनात्मक बदलावों से गुजरती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, डिलीवरी के बाद महिलाओं में होने वाला पोस्टपार्टम डिप्रेशन यानी पीपीडी एक गंभीर मानसिक स्थिति है, जिसे अक्सर सामान्य थकान या मूड स्विंग समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

नवजात शिशु के जन्म के बाद परिवार का पूरा ध्यान बच्चे की देखभाल पर केंद्रित हो जाता है। ऐसे में नई मां खुद को अकेला और भावनात्मक रूप से असुरक्षित महसूस करने लगती है। खासतौर पर पहली बार मां बनी महिलाओं के लिए यह दौर बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। बच्चे की जिम्मेदारियां, नींद की कमी और लगातार बदलती दिनचर्या मानसिक दबाव को बढ़ा देती है।

WHO ने दी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चेतावनी

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, माता-पिता बनना जीवन का बड़ा बदलाव होता है और हर व्यक्ति इसे एक जैसा नहीं संभाल पाता। बच्चे के जन्म के बाद खुशी, प्यार और उत्साह के साथ घबराहट, चिंता और निराशा महसूस होना सामान्य माना जाता है, लेकिन जब ये भावनाएं लंबे समय तक बनी रहें और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगें, तब यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन का संकेत हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय परिवारों में अब भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता। कई बार महिलाओं की भावनात्मक परेशानियों को मामूली समझकर टाल दिया जाता है, जिससे स्थिति और गंभीर हो सकती है।

कब शुरू होता है पोस्टपार्टम डिप्रेशन

हालांकि पोस्टपार्टम डिप्रेशन की कोई तय समय सीमा नहीं होती, लेकिन आमतौर पर इसके लक्षण बच्चे के जन्म के दो से आठ हफ्तों के भीतर दिखाई देने लगते हैं। यह स्थिति मां के मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ बच्चे की देखभाल को भी प्रभावित कर सकती है।

चिकित्सकों के मुताबिक, कई मामलों में इसका पता काफी देर से चलता है क्योंकि महिलाएं अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर पातीं। परिवार और समाज का दबाव भी उन्हें अपनी मानसिक स्थिति छिपाने के लिए मजबूर कर देता है।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन के क्या हैं लक्षण

पोस्टपार्टम डिप्रेशन से पीड़ित महिलाओं में लगातार उदासी, खालीपन और रोने का मन होना आम लक्षण माने जाते हैं। कई बार मां अपने ही बच्चे के साथ भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं कर पाती। इसके अलावा खुद को अयोग्य समझना, बच्चे की परवरिश को लेकर आत्मविश्वास खो देना, नींद न आना, लगातार थकान महसूस होना, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी और खाने की आदतों में बदलाव जैसे संकेत भी दिखाई दे सकते हैं।

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर महिला के मन में खुद को या बच्चे को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार आने लगें, तो इसे गंभीर स्थिति माना जाना चाहिए और तुरंत चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।

परिवार का सहयोग और सही इलाज बेहद जरूरी

डॉक्टरों के अनुसार, प्रसव के बाद महिलाओं के शरीर में कई हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिससे मानसिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। ऐसे समय में परिवार का सहयोग सबसे अहम भूमिका निभाता है। पति, परिवार और करीबी लोगों को नई मां की भावनाओं को समझने और उनका साथ देने की जरूरत होती है।

यदि स्थिति में सुधार नहीं हो रहा हो, तो मनोचिकित्सक, डॉक्टर या काउंसलर से सलाह लेना जरूरी है। जरूरत पड़ने पर दवाइयों की मदद भी ली जा सकती है। इसके साथ ही पर्याप्त आराम, पौष्टिक भोजन, हल्का व्यायाम और छोटी-छोटी नींद मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकती हैं।

 

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